बारिश उस रात कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी।
ऐसी बारिश जिसमें सड़क की आवाज़ भी दब जाती है और इंसान अपने ही दिल की धड़कन सुनने लगता है।
घड़ी में 11:47 PM हो रहे थे।
आरव शर्मा बाइक चलाते हुए बार-बार पीछे देख रहा था।
ऐसा नहीं था कि कोई उसका पीछा कर रहा था, बल्कि उसे लग रहा था कि कोई देख रहा है।
आरव एक छोटा-सा न्यूज़ रिपोर्टर था। बड़ी खबरें उसे नहीं मिलती थीं,
लेकिन उसे उन जगहों पर जाना पसंद था जहाँ बाकी लोग जाने से डरते थे।
तीन महीनों में चार लोग लापता।
सभी का आख़िरी लोकेशन – शांति विहार कॉलोनी।
पुलिस का कहना था:
“पुरानी कॉलोनी है, नशेड़ी रहते हैं, लोग खुद भाग जाते होंगे।”
लेकिन आरव को यह कहानी अधूरी लग रही थी।
कॉलोनी के गेट पर पहुँचते ही उसकी बाइक अपने आप बंद हो गई।
चाबी घुमाई – कुछ नहीं।
मोबाइल निकाला, नेटवर्क एक भी नहीं।
गेट पर जंग लगा बोर्ड टंगा था:
“शांति विहार – 1996”
उसके नीचे किसी ने काले पेंट से लिखा था:
“अंदर मत आना”
आरव हल्का-सा हँसा, लेकिन हँसी ज़बरदस्ती की थी।
जैसे ही उसने कॉलोनी में कदम रखा,
हवा अचानक ठंडी हो गई।
इतनी ठंडी कि साँस से भाप निकलने लगी।
चारों तरफ़ 6 इमारतें थीं।
तीन मंज़िला।
सबकी खिड़कियाँ बंद।
एक भी आवाज़ नहीं।
ना कुत्ते,
ना बिल्ली,
ना पत्तों की सरसराहट।
आरव ने कैमरा ऑन किया।
“मैं इस समय शांति विहार कॉलोनी में हूँ, जहाँ-”
तभी फोन बज उठा।
📞 Unknown Number
आरव रुक गया।
उसने कॉल उठाई।
दूसरी तरफ़ एक बुज़ुर्ग आदमी की काँपती आवाज़ थी:
“आप भी… आ गए?”
“कौन बोल रहा है?”
“आप कहाँ हैं?”
फोन कट गया।
आरव के हाथ पसीने से भीग गए।
उसी पल तीसरे ब्लॉक की दूसरी मंज़िल पर
पीली लाइट जली।
इतनी देर बाद कोई हलचल देखकर आरव वहीं चला गया।
सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसे लगा जैसे
कोई पीछे से साँस ले रहा हो।
लेकिन जब मुड़ा – कोई नहीं।
फ्लैट का दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर कदम रखते ही
नाक में सड़न और नमी की गंध भर गई।
दीवारों पर पुराने अख़बार चिपके थे।
सब पर एक ही तरह की खबरें:
- “युवक रहस्यमय ढंग से गायब”
- “मोबाइल आख़िरी बार शांति विहार में एक्टिव”
- “कोई सुराग नहीं”
बीच में एक पुराना लैंडलाइन फोन रखा था।
फोन अचानक बजने लगा।
आरव का दिल ज़ों से धड़क उठा।
उसने काँपते हाथों से रिसीवर उठाया।
अबकी बार आवाज़ साफ़ थी, लेकिन ठंडी:
“हम सबने यही गलती की थी… कॉल उठा ली थी।”
“किसकी कॉल?” आरव चिल्लाया।
“हमारी… अपनी मौत की।”
पीछे से कदमों की आवाज़ आई।
आरव पलटा।
चार लोग खड़े थे।
वही चार – जिनके पोस्टर उसने देखे थे।
उनकी आँखें खाली थीं,
जैसे उनमें ज़िंदगी कभी थी ही नहीं।
सबके हाथ में मोबाइल थे।
एक लड़की बोली:
“हमने मदद समझकर कॉल उठाई थी।”
एक आदमी बोला:
“फोन ने हमें बुलाया।”
तीसरे ने कहा:
“और फिर…”
सब एक साथ बोले:
“हम यहीं फँस गए।”
लाइट एकदम से बुझ गई।
फोन आरव के हाथ से गिर गया।
अंधेरे में सिर्फ़ एक आवाज़ गूँज रही थी:
📞 ट्रिन… ट्रिन…
अगली सुबह
पुलिस को कॉलोनी के गेट पर आरव की बाइक मिली।
कैमरा ज़मीन पर पड़ा था।
रिकॉर्डिंग चालू थी।
आख़िरी फुटेज में आरव कैमरे की तरफ़ देखता है, उसकी आँखों में डर साफ़ दिखता है:
“अगर ये वीडियो मिले… तो कभी… किसी अनजान कॉल को… यहाँ…”
अचानक स्क्रीन ब्लैक।
तीन दिन बाद शहर में एक और पोस्टर लगा:
“लापता – आरव शर्मा”
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भाग 2: कॉल अभी ज़िंदा है
छह महीने बाद।
नैना अब सोती नहीं थी।
आरव की आवाज़ उसके कानों में गूँजती रहती थी।

पुलिस से मिला उसका फोन
उसने कभी ऑन नहीं किया।
लेकिन उस रात…
2:13 AM
फोन खुद ऑन हुआ।
📞 Incoming Call
नंबर – No Caller ID
नैना ने कॉल उठा ली।
गलती हो गई।
दूसरी तरफ़ सन्नाटा।
फिर आरव की आवाज़:
“दीदी… यहाँ टाइम रुक गया है।”
नैना काँप गई।
“आप कहाँ हो?”
“हर कॉल में…”
“हर फोन में…”
“मैं आपको निकाल लूँगी!”
थोड़ी देर चुप्पी।
फिर बहुत गंभीर आवाज़:
“अगर कोई एक बार कॉल का हिस्सा बन गया…”
“तो वो बाहर नहीं आता…”
फोन कट।
अगले दिन नैना शांति विहार पहुँची।
गेट खुला था।
अंदर वही ठंड।
लेकिन इस बार…
कॉलोनी में कई लाइट्स जल रही थीं।
जैसे किसी ने इंतज़ार किया हो।
उसका फोन बजा।
📞 Unknown
एक साथ कई आवाज़ें बोलीं:
“स्वागत है।”
उसने देखा –
हर खिड़की में
एक इंसान खड़ा था।
सबके हाथ में मोबाइल।
सबकी आँखें खाली।
और कॉलोनी के बीचोंबीच
एक बहुत बड़ा फोन बूथ रहस्य्मयी तरीके से उग आया था।
फोन बूथ के अंदर
आरव खड़ा था।
लेकिन उसकी आँखें…
अब उसकी नहीं थीं।
आरव बोला:
“अब यह जगह तुम्हें चुन चुकी है।”
नैना पीछे मुड़ी।
गेट गायब।
फोन उसके हाथ में बजने लगा।
📞 “अब कॉल उठाओ।”