बहुत पुराने समय की बात है, जब रेगिस्तान सिर्फ रेत का सागर नहीं था, बल्कि कहानियों, संघर्षों और सपनों का घर हुआ करता था। दूर-दूर तक फैली सुनहरी रेत, तपता हुआ सूरज और रात को सन्नाटे में गूंजती हवाएँ – ऐसे ही एक सूखे और कठोर इलाके में बसा था फ़ारस का एक प्राचीन शहर खलेसिया।
ऊँची दीवारों से घिरा वह शहर बाहर से मजबूत दिखता था, लेकिन अंदर रहने वाले लोग अक्सर गरीबी, डर और अनिश्चित भविष्य से जूझते रहते थे।
इसी शहर के बाहर, खजूर के कुछ पेड़ों और उजड़े हुए टीलों के पास रहता था एक 18 साल का गरीब, मासूम और बेहद नेकदिल लड़का – सलाहदीन। उसके न माँ-बाप थे, न घर, न ही कोई स्थायी काम।
लेकिन उसके पास था एक ऐसा साथी, जो हर सुख-दुख में उसके साथ रहता था – उसका प्यारा सा बंदर। वह बंदर सिर्फ जानवर नहीं था, बल्कि सलाहदीन का दोस्त, उसका परिवार और उसका सबसे बड़ा सहारा था।
सलाहदीन का जीवन बहुत सादा था। सुबह सूरज निकलते ही वह उठ जाता, थोड़ा सा पानी पीता और अपने बंदर को कंधे पर बैठाकर शहर की ओर चल पड़ता। कभी वह किसी दुकानदार का सामान उठाने में मदद करता, कभी किसी किसान के लिए पानी भर देता, तो कभी किसी बूढ़े को रास्ता पार कराता।
बदले में जो मिलता, वही उसका भोजन बन जाता। कभी सूखी रोटी, कभी खजूर, तो कभी सिर्फ पानी।
लेकिन सलाहदीन कभी शिकायत नहीं करता था। वह मुस्कराकर कहता,
“जिसके पास दिल का सुकून है, वही सबसे अमीर है।”
शहर के लोग भी उसे पहचानते थे। बच्चे उसे देखकर खुश हो जाते, क्योंकि उसका बंदर उन्हें हँसाता था। बुज़ुर्ग उसे दुआएँ देते, क्योंकि उसकी बातों में सच्चाई और आँखों में इज़्ज़त होती थी।
कुछ नेक लोग ऐसे भी थे, जो उसे और उसके बंदर को खाना खिला देते। इसी तरह दया और मेहनत के सहारे सलाहदीन अपनी ज़िंदगी जी रहा था।
दुश्मन सेना का हमला
एक दिन शहर का माहौल अचानक बदल गया। सुबह से ही अजीब सी बेचैनी थी। सैनिक घोड़ों पर सवार होकर इधर-उधर दौड़ रहे थे। फिर अचानक ढोल की आवाज़ गूंजी और राजा के सैनिक गलियों में ऐलान करने लगे –
“दुश्मन हमारी सीमा तक पहुँच चुका है। उनकी सेना बहुत बड़ी और ताकतवर है। उनसे जीतना लगभग नामुमकिन है।”
यह सुनते ही पूरे शहर में डर फैल गया। बाज़ार बंद होने लगे, लोग अपने घरों में छुपने लगे। महिलाएँ रोने लगीं, बच्चे सहम गए। सैनिकों के चेहरों पर डर साफ दिख रहा था।
यहाँ तक कि राजा, जो हमेशा साहस और शान का प्रतीक माना जाता था, उसका भी सिर झुक गया। उसने अपने मंत्रियों से कहा –
“हमारी ताकत उनसे बहुत कम है। शायद अब हार तय है।”
राजा की यह बात जैसे पूरे शहर की हिम्मत तोड़ गई।
उम्मीद की एक चिंगारी
उसी भीड़ में, दूर खड़ा सलाहदीन सब कुछ देख और सुन रहा था। उसका बंदर उसके कंधे पर बैठा हुआ बेचैनी से इधर-उधर देख रहा था। सलाहदीन की आँखों में डर नहीं, बल्कि आग थी।
उसने मन ही मन सोचा –
“अगर सब हार मान लेंगे, तो ये शहर मिट जाएगा।”
सलाहदीन ने बिना सोचे-समझे किले की ओर कदम बढ़ा दिए। सैनिकों ने पहले उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज़ में ऐसा विश्वास था कि वे चुप हो गए।
दरबार में पहुँचकर उसने राजा से कहा –
“सुलतान, जंग तलवार से नहीं, अक़्ल से जीती जाती है। अगर आप मुझे मौका दें, तो मैं कोशिश करना चाहता हूँ।”
पूरा दरबार सन्न रह गया। एक गरीब लड़का, फटे कपड़े, नंगे पाँव – और राजा को सलाह दे रहा है! कुछ मंत्री हँस पड़े, कुछ ने नाराज़गी दिखाई।
लेकिन राजा ने सलाहदीन की आँखों में झाँका। वहाँ डर नहीं था, सिर्फ सच्चा साहस था। राजा ने भारी मन से कहा –
“जब कोई उम्मीद नहीं बची, तो क्यों न इस लड़के पर भरोसा किया जाए। इसे मौका दिया जाए।”
सलाहदीन ने तुरंत योजना बनानी शुरू कर दी। उसने सैनिकों को आदेश दिया –
“किले की दीवारों पर जितना तेल मिल सके, इकट्ठा करो। बड़े-बड़े बर्तनों में उसे गरम करो।”

सैनिकों को पहले यह योजना अजीब लगी, लेकिन उन्होंने आदेश मान लिया। सलाहदीन खुद हर जगह जाकर देखता रहा। उसका बंदर भी कभी रस्सी खींचता, कभी संदेश पहुँचाने में मदद करता।
जंग की शुरुआत
कुछ ही समय बाद दुश्मन की विशाल सेना किले के पास पहुँच गई। वे जीत को तय मानकर आगे बढ़ रहे थे।
जैसे ही दुश्मन दीवारों के नीचे पहुँचा, सलाहदीन ने हाथ उठाकर संकेत दिया।
ऊपर से खौलता हुआ तेल दुश्मनों पर गिराया गया। चीख-पुकार मच गई। सैनिक जलने लगे, उनके कपड़े और कवच तेल में भीग गए।
तभी सलाहदीन ने ज़ोर से पुकारा –
“अब आग वाले तीर चलाओ!”
जलते हुए तीर आसमान को चीरते हुए दुश्मनों पर बरस पड़े। तेल में भीगे सैनिक आग की लपटों में घिर गए। डर और अफरातफरी में दुश्मन की पंक्तियाँ टूटने लगीं।
कुछ ही देर में उनकी बड़ी सेना मारी गई और जो बचे, वे जान बचाकर भाग खड़े हुए।
यह दृश्य देखकर शहर की सेना में नई जान आ गई। सैनिक खुशी से रो पड़े। पूरे शहर में नारे गूंजने लगे –
“सलाहदीन ज़िंदाबाद!”
“फ़ारस का शेर!”
राजा खुद किले की दीवार पर आया और सलाहदीन को गले लगा लिया। उसने कहा –
“तुमने न सिर्फ हमारा शहर, बल्कि हमारी इज़्ज़त बचाई है।”
खुशी में राजा ने अपनी बेटी का विवाह सलाहदीन से करने का प्रस्ताव रखा। सलाहदीन ने पहले अपने बंदर दोस्त को देखा, फिर झुककर कहा –
“अगर मेरी ज़िंदगी इस राज्य और इसकी जनता के काम आ सके, तो यह मेरे लिए गर्व की बात होगी।”
Moral of the Story
इस तरह एक गरीब, भूखा और अकेला लड़का फ़ारस का राजा बना। लेकिन सत्ता ने उसका दिल नहीं बदला। वह आज भी गरीबों की मदद करता था और उसका बंदर हमेशा उसके साथ रहता था।
सीख:
सच्ची बहादुरी धन या ताकत से नहीं, बल्कि हिम्मत, समझदारी और नेक दिल से जन्म लेती है।
जो दूसरों के लिए खड़ा होता है, एक दिन दुनिया उसके लिए खड़ी हो जाती है। 🌙