गरीब रामू का जंगल में बसा एक छोटा संसार | Emotional Bedtime Story

जंगल हमेशा से रहस्यमय होता है।
दिन में हरा-भरा, शांत और जीवन से भरा हुआ।
और रात में गहरा, सन्नाटा ओढ़े, जैसे हर पेड़ कोई कहानी छुपाए बैठा हो।

उसी जंगल के बीचों-बीच, एक छोटी-सी मिट्टी और लकड़ी की बनी झोपड़ी थी।
छत सूखे पत्तों और घास से ढकी हुई।
दरवाज़ा नहीं था, बस एक मोटा पर्दा लटका रहता था, जो हवा में हिलता-डुलता रहता।

इसी झोपड़ी में रहता था एक छोटा-सा परिवार –
रामू,
उसकी पत्नी सीता,
और उनका आठ साल का बेटा मोहन

यह परिवार जंगल में किसी शौक़ से नहीं रहता था।
उनकी ज़िंदगी ने उन्हें यहाँ तक पहुँचाया था।

रामू कभी शहर में रहता था।
शहर जहाँ हर सुबह जल्दी उठना पड़ता है,
और हर रात थककर सोना पड़ता है।

वह एक फैक्ट्री में मज़दूरी करता था।
दिन-भर मशीनों का शोर,
धुएँ की बदबू,
और लगातार भागती ज़िंदगी।

सीता घरों में बर्तन माँज लेती थी।
मोहन पास के सरकारी स्कूल में पढ़ता था।
छोटा-सा कमरा था,
लेकिन उसमें सपने भरे थे।

रामू चाहता था कि उसका बेटा पढ़-लिख जाए,
ताकि उसे उसकी तरह मज़दूरी न करनी पड़े।

लेकिन ज़िंदगी अक्सर हमारी चाहत नहीं पूछती।

एक दिन फैक्ट्री में ज़्यादा काम के कारण रामू चक्कर खाकर गिर पड़ा।
पीठ में तेज़ दर्द रहने लगा।
डॉक्टर ने साफ़ कहा
अब भारी काम मत करना, वरना चलना भी मुश्किल हो जाएगा।

काम छूट गया।
दवाइयों का खर्च बढ़ गया।
और फिर एक दिन मकान मालिक आया।

उसकी आवाज़ में कोई हमदर्दी नहीं थी।
तीन महीने का किराया बाकी है। घर खाली करना होगा।

सीता ने बहुत मिन्नत की।
रामू ने बहुत समझाया।
लेकिन किसी ने नहीं सुना।

उस रात मोहन ने पहली बार अपने पिता को चुपचाप रोते देखा।

उस रात रामू देर तक जागता रहा।
छत की दरारों से झांकते आसमान को देखता रहा।
तभी उसे अपना बचपन याद आया।

एक समय था जब वह भी जंगल के पास ही रहता था।
उसके माता-पिता जंगल पर निर्भर थे।
लकड़ी, फल, शहद – सब कुछ वहीं से मिलता था।

अगली सुबह उसने सीता से कहा,
शहर हमें नहीं चाहता…
चलो जंगल चलते हैं।
कम से कम खुली हवा तो मिलेगी
।”

सीता डर गई।
जंगल? वहाँ कैसे रहेंगे?

रामू बोला,
डर तो यहाँ भी है।
वहाँ शायद जीने की जगह मिल जाए।

कुछ ही दिनों में वे शहर छोड़कर जंगल आ गए।

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नई शुरुआत, नए डर

जंगल ने उन्हें शांति तो दी,
लेकिन आसान जीवन नहीं।

रामू ने पुराने अनुभव से झोपड़ी बनानी शुरू की।
लकड़ियाँ काटीं,
मिट्टी लगाई,
छत पर सूखे पत्ते बिछाए।

पहली रात बहुत ठंडी थी।
हवा सीधे अंदर घुस आती थी।

सीता ने मोहन को सीने से चिपका लिया।
मोहन ने फुसफुसाकर पूछा,
माँ, यहाँ कोई हमें नुकसान तो नहीं पहुँचाएगा?

सीता ने हिम्मत दिखाते हुए कहा,
नहीं बेटा… हम साथ हैं न।

लेकिन उसके दिल में डर था।

बारिश का मौसम आया तो मुश्किलें बढ़ गईं।
झोपड़ी से पानी टपकने लगा।
सीता बर्तन रख-रखकर पानी रोकती।

कभी-कभी कई दिन तक
बस जंगली फल और उबले कंद ही खाने को मिलते।

मोहन अक्सर भूखा सो जाता।
लेकिन कभी शिकायत नहीं करता।

एक दिन उसने कहा,
पापा, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा न…
तो मैं आपके लिए पक्का घर बनाऊँगा।

रामू की आँखें भर आईं।

एक रात तेज़ आँधी आई।
पेड़ ज़ोर-ज़ोर से हिल रहे थे।
जानवरों की आवाज़ें जंगल को और डरावना बना रही थीं।

अचानक झोपड़ी के बाहर कुछ सरकने की आवाज़ आई।

मोहन डर से काँपने लगा।
सीता ने उसे ढक लिया।

रामू ने आग से जलती लकड़ी उठाई और बाहर निकला।
दिल तेज़-तेज़ धड़क रहा था।

उसे नहीं पता था कि बाहर क्या है।
लेकिन उसे इतना ज़रूर पता था
अगर कुछ हुआ,
तो वह अपने परिवार के सामने खड़ा रहेगा।

कुछ देर बाद आवाज़ बंद हो गई।
शायद कोई जानवर रास्ता बदल गया था।

रामू वापस अंदर आया।
सीता ने राहत की साँस ली।

जंगल से दोस्ती

समय के साथ जंगल ने उन्हें अपनाना शुरू किया।

रामू ने शहद निकालना सीख लिया।
लकड़ियाँ इकट्ठी कर हाट में बेचने लगा।

सीता जंगली फूल चुनती।
झोपड़ी को साफ़ रखती।

मोहन पेड़ों से बातें करता।
हर पेड़ का नाम रख दिया था उसने।

वह कहता,
ये मेरा दोस्त है…
ये मेरी टीचर है…
और ये मुझे कहानी सुनाता है।

हर रात तीनों आग के पास बैठते।
सीता मोहन को कहानी सुनाती।
रामू चुपचाप आग को देखता।

उसके मन में सवाल होते –
क्या उसका बेटा कभी स्कूल जाएगा?
क्या उनका जीवन कभी आसान होगा?

लेकिन फिर वह सीता और मोहन की तरफ़ देखता।
उनकी मुस्कान उसे हिम्मत देती।

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कहानी से सीख

यह परिवार जंगल में इसलिए नहीं रहता था क्योंकि उन्हें विलासिता पसंद थी,
बल्कि इसलिए क्योंकि यहीं उन्हें फिर से जीने का मौका मिला।

उनके पास
बिजली नहीं थी
बड़ा घर नहीं था
पैसे नहीं थे

लेकिन उनके पास था

एक-दूसरे का साथ, हिम्मत और उम्मीद

और यही किसी भी इंसान की असली दौलत होती है।

उस रात भी, जंगल की उस छोटी-सी झोपड़ी में,
तीन दिल एक साथ धड़कते हुए चैन की नींद सो गए।

शुभ रात्रि ✨

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