सोनपुर एक छोटा-सा गाँव था। कच्ची गलियाँ, मिट्टी की खुशबू, सुबह की अज़ान और शाम की आरती सब कुछ बहुत सादा, बहुत अपना। गाँव के ठीक बीचों-बीच एक विशाल बरगद का पेड़ खड़ा था। उसकी जड़ें ज़मीन से बाहर निकलकर ऐसे फैल गई थीं जैसे किसी बूढ़े ने अपने हाथ फैला रखे हों। लोग कहते थे, यह पेड़ उनके दादा-परदादाओं के ज़माने से यहाँ है।
गाँव के बच्चे उसके नीचे खेलते, बूढ़े उसकी छाया में बैठकर बीते ज़माने की बातें करते।
लेकिन उस पेड़ के लिए सबसे खास था एक बच्चा दस साल का मोहन।
मोहन दुबला-पतला, साँवला-सा, बड़ी-बड़ी आँखों वाला लड़का था। उसके कपड़े अक्सर पुराने रहते, जूते कई बार सिले हुए होते। उसके पापा खेतों में मज़दूरी करते थे और माँ दूसरों के घरों में काम। घर में प्यार था, लेकिन सुविधाएँ कम थीं।
मोहन रोज़ स्कूल से लौटकर सीधे उसी बरगद के पास आता। वह अपनी किताबें एक तरफ रखता, जड़ों पर बैठ जाता और आसमान देखने लगता।
एक दिन, जब उसकी आँखों में आँसू थे, अचानक किसी ने कहा
“इतनी चुप्पी ठीक नहीं है, बच्चे।”
मोहन चौंक गया।
“क…कौन है?” उसने डरते हुए पूछा।
“मैं,” गहरी और शांत आवाज़ आई,
“जिसकी छाया में बैठा है।”
मोहन ने धीरे-धीरे ऊपर देखा।
“आप… पेड़ होकर बोल रहे हो?”
पेड़ हँसा।
“जो सुन सकता है, वही बोल भी सकता है, मोहन।”
उस दिन से मोहन का डर खत्म हो गया और एक अनोखी दोस्ती शुरू हुई।
एक सच्चा दोस्त जो हर बात सुनता है
अब मोहन रोज़ पेड़ से बातें करने लगा।
“आज मास्टर जी ने सबके सामने डाँट दिया।”
“आज गणित का सवाल नहीं बना।”
“आज रमेश ने कहा कि मैं कुछ नहीं बन पाऊँगा।”
पेड़ हर बार ध्यान से सुनता और फिर कहता-
“डाँट आईना होती है, अगर सही जगह पड़ी तो इंसान सुधरता है।”
“सवाल वही कठिन लगता है, जिसे अभी समझा नहीं।”
“जो खुद को छोटा मान ले, वही छोटा रह जाता है।”
मोहन को लगता था जैसे यह पेड़ उसके दिल के अंदर झाँक लेता हो।
वह पेड़ से वो बातें भी कह देता, जो किसी इंसान से कहने में डर लगता है।
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चमकती हुई गलत दोस्ती
कुछ महीनों बाद गाँव में शहर से आए दो लड़के रहने लगे-राहुल और विक्की। उनके पास मोबाइल थे, नए कपड़े थे, बड़ी-बड़ी बातें थीं।
“पढ़ाई से कुछ नहीं होता,” वे कहते,
“मज़े करो, ज़िंदगी छोटी है।”
मोहन पहली बार उनकी बातों से प्रभावित हुआ।
वह उनके साथ घूमने लगा, स्कूल से भागने लगा।
एक दिन वह देर से बरगद के पास पहुँचा।
“आज बहुत देर हो गई,” पेड़ ने कहा।
“आप क्या जानते हो ज़िंदगी के बारे में?” मोहन झुँझलाया,
“आप तो बस यहीं खड़े रहते हो।”
पेड़ चुप हो गया।
बहुत देर बाद बोला-
“जब सच्चा दोस्त कड़वी बात कहे,
तो समझ लेना वह तुम्हें बचाना चाहता है।”
मोहन बिना कुछ बोले चला गया।
गलत संगत की पहचान
एक दिन राहुल और विक्की ने मोहन को उकसाया-
“चल, दुकान से टॉफी उठा लेते हैं, कौन देखेगा?”
मोहन का मन काँप रहा था, लेकिन वह साथ चला गया।
दुकानदार ने पकड़ लिया।

पूरा गाँव जमा हो गया।
मोहन के पापा की आँखें ज़मीन में गड़ी थीं।
माँ रो रही थी।
रात को मोहन चुपके से बरगद के पास आया।
वह ज़मीन पर बैठकर फूट-फूटकर रो पड़ा।
“मैं बहुत बुरा हूँ,” उसने कहा,
“आप सही थे… मैं गलत रास्ते पर चला गया।”
पेड़ की आवाज़ आज बहुत गंभीर थी
“मोहन, गिरना इंसान की फितरत है,
पर वहीं पड़े रहना उसकी सबसे बड़ी गलती।”
“अब क्या करूँ?” मोहन काँपता हुआ बोला।
“कल सबके सामने सच बोलना,”
पेड़ ने कहा।
“हिम्मत वही करता है जो सच्चा दोस्त होता है-खुद का भी।”
सच का सामना
अगले दिन पंचायत में मोहन खड़ा हुआ।
उसकी टाँगें काँप रही थीं, लेकिन आवाज़ साफ थी।
“गलती मेरी थी,” उसने कहा,
“किसी ने मुझे मजबूर नहीं किया।”
पूरा गाँव चुप हो गया।
पापा ने पहली बार उसका सिर थपथपाया।
उसी दिन मोहन ने तय कर लिया-
अब वह मेहनत से पढ़ेगा।
दोस्ती की सबसे बड़ी परीक्षा
कुछ हफ्तों बाद खबर फैली-
“बरगद बहुत पुराना हो गया है, गिर सकता है, काटना पड़ेगा।”
मोहन दौड़ता हुआ पेड़ के पास आया।
“आपको काट देंगे,” वह रोने लगा।
पेड़ मुस्कुराया,
“अगर मेरी वजह से तुम मजबूत बन गए हो तो अब मैं सफल हो चूका हूँ
वैसे भी अब मैं काफी बूढा भी हो गया हूँ।”
“नहीं,” मोहन चिल्लाया,
“आप मेरे दोस्त हो!”
पेड़ ने कहा-
“दोस्ती का मतलब हमेशा साथ रहना नहीं होता,
दोस्ती का मतलब होता है-
तुम्हें अकेले चलना सिखा देना।”
उस रात तेज़ आँधी आई।
एक बड़ी शाखा टूट गई।
पूरा गाँव डर गया।
लेकिन सुबह बरगद अब भी खड़ा था।
अब लोगों ने समझ लिया कि पेड़ काटने की कोई ज़रुरत नहीं।
मोहन बड़ा खुश हुआ।
दोस्त की सच्ची जीत
साल बीतते गए।
मोहन पढ़-लिखकर गाँव का शिक्षक बन गया।
वह बच्चों को सिर्फ किताबें नहीं,
सही दोस्ती और सही रास्ता सिखाता था।
बरगद अब कमजोर था,
पर उसकी छाया अब भी उतनी ही सुकून देती थी।
मोहन ने तने पर हाथ रखा।
“आप अभी भी मेरे सबसे अच्छे दोस्त हैं ।”
पेड़ ने धीरे से कहा
“नहीं मोहन,
मैंने सिर्फ तुम्हें तुम पर विश्वास करना सिखाया।
अच्छा दोस्त वही करता है।”
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कहानी की सीख
- अच्छे दोस्त हमें सही रास्ता दिखाते हैं
- वे सच बोलते हैं, चाहे वह कड़वा हो
- वे हमें मजबूत बनाते हैं, निर्भर नहीं
इसलिए दोस्त सोच-समझकर बनाओ,
क्योंकि एक सच्चा दोस्त पूरी ज़िंदगी बदल सकता है।