राजा धर्मवीर और ड्रैगन की कहानी | Shikshaprad Kahani in Hindi

नैतिक कहानियाँ बच्चों के दिल को छू जाती हैं। ऐसी कहानियों से बच्चे सीखते हैं कि सच्चाई बोलना, ईमानदार रहना और मेहनत करना कितना जरूरी है। जब बच्चे इन कहानियों को सुनते हैं, तो उनके मन में अच्छा बनने की चाह जगती है और वे सही रास्ते पर चलना सीखते हैं।

बहुत समय पहले की बात है। एक दूर देश में एक बहुत ही नेक और दयालु राजा रहता था – उसका नाम था राजा धर्मवीर
वह सच में अपनी प्रजा से बहुत प्यार करता था। हर सुबह वह दरबार में लोगों की बातें सुनता, उनकी परेशानियाँ हल करता, और हमेशा यही सोचता कि “मेरे राज्य में कोई दुखी नहीं रहना चाहिए।”

लोग कहते थे – “राजा धर्मवीर जैसा न्यायप्रिय राजा दूसरा कोई नहीं।”
वह न कभी किसी पर अन्याय करता, न किसी को भूखा रहने देता।

लेकिन एक दिन उसके राज्य में बहुत बड़ी समस्या आ गई।

पहाड़ों का डरावना रहस्य

राज्य के उत्तर की तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ थे। उन्हीं पहाड़ों के बीच एक बहुत बड़ा ड्रैगन रहता था।
वह आग उगलता था, और कभी-कभी अचानक नीचे के गाँवों में आकर तबाही मचा देता।
लोगों की फसलें जल जातीं, घर जल जाते, जानवर भाग जाते।

गाँव वाले डर के मारे रात को सो भी नहीं पाते थे।
बच्चे रोते रहते, और लोग हर दिन यही सोचते – “कहीं आज फिर ड्रैगन ना आ जाए।”

जब यह खबर राजा धर्मवीर तक पहुँची, तो उसने तुरंत अपने बहादुर सैनिकों को भेजा।
सैनिकों ने बहुत कोशिश की, पर वह ड्रैगन इतना ताकतवर था कि उसने आग उगलकर उन्हें भगा दिया।
कई घायल होकर लौट आए।

राजा को बहुत दुख हुआ। उसने सोचा, “अगर ऐसा ही चलता रहा तो मेरा राज्य बर्बाद हो जाएगा, और लोग हमेशा डर में जिएँगे।

राजा देर रात तक सोचता रहा। फिर उसने अपने सबसे समझदार मंत्री विजयसेन को बुलाया।
राजा ने कहा, “मंत्रीजी, तलवार और ताकत से तो यह ड्रैगन नहीं रुक रहा। अब क्या करें?

विजयसेन ने कुछ देर चुप रहकर कहा,
महाराज, कभी-कभी हर समस्या का हल युद्ध नहीं होता।
कभी-कभी दुश्मन से बात करने से, उसे समझने से भी बड़ा काम हो जाता है।
शायद वह ड्रैगन भी किसी तकलीफ़ में हो
।”

राजा को यह बात समझ में आ गई।
उसने कहा, “ठीक है, मैं खुद जाकर उससे मिलूँगा। अगर वह दुश्मन है, तो मैं समझ कर ही जानूँगा कि क्यों।”

गुफा की ओर सफर

अगले दिन सुबह-सुबह राजा ने अपने कुछ भरोसेमंद सैनिक लिए और पहाड़ों की तरफ़ निकल पड़ा।
रास्ते में गाँव वाले डरकर उससे बोले,
महाराज, मत जाइए! वह बहुत भयानक है। वह आग उगल देता है। आप वापस लौट आइए।”

पर राजा ने मुस्कराकर कहा,
अगर मैं डर जाऊँ, तो मेरे लोग कौन बचाएगा? डर से नहीं, समझ से लड़ना चाहिए।”

जैसे-जैसे राजा आगे बढ़ा, हवा गर्म होने लगी। जमीन पर जले हुए पेड़ पड़े थे।
आख़िरकार राजा उस गुफा तक पहुँचा जहाँ से धुआँ निकल रहा था।

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ड्रैगन से मुलाकात

अंदर बहुत अंधेरा था। राजा ने मशाल जलाई और अंदर गया।
अचानक ज़मीन हिलने लगी, और एक बहुत बड़ा ड्रैगन उसके सामने आ गया!

उसकी आँखें लाल आग जैसी थीं, उसके पंख इतने बड़े थे कि हवा की तेज़ लहरें उठने लगीं।
ड्रैगन गरजा,
“कौन हो तुम? क्या तुम भी मुझे मारने आए हो, जैसे बाकी सब आए थे?”

राजा ने शांत आवाज़ में कहा,
“नहीं, मैं तुम्हें मारने नहीं आया हूँ। मैं यह जानने आया हूँ कि तुम ऐसा क्यों करते हो। तुम गाँवों को क्यों जलाते हो?”

ड्रैगन कुछ देर चुप रहा, फिर भारी आवाज़ में बोला,
तुम पहले इंसान हो जिसने मुझसे यह सवाल किया। बाकी सब तो बस मुझे दानव समझते हैं।
पहले इन पहाड़ों में बहुत पेड़ थे, बहुत जानवर थे।
मैं शिकार करता था, जंगल में रहता था।
लेकिन अब लोगों ने सारे पेड़ काट दिए हैं। जंगल खाली हो गया है।
मेरे पास अब खाने को कुछ नहीं बचा, इसलिए मजबूरी में मुझे गाँवों में जाना पड़ता है।”

ड्रैगन की आवाज़ में ग़ुस्से से ज़्यादा दर्द था।
राजा चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा। उसे एहसास हुआ कि ड्रैगन दुश्मन नहीं, बस भूखा और बेघर है।

राजा का वादा

राजा ने कहा,
“मैं तुम्हारी बात समझ गया। अगर मैं तुम्हारे लिए कुछ करूँ, तो क्या तुम वादा करोगे कि अब किसी गाँव पर हमला नहीं करोगे?”

ड्रैगन बोला,
“अगर तुम सच में जंगल वापस ला सको, तो मैं कसम खाता हूँ – कभी किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”

राजा ने सिर हिलाया और कहा,
“मैं तुम्हें अपना वचन देता हूँ।”

राज्य में बड़ा बदलाव

राजा वापस अपने महल आया और पूरे राज्य में ऐलान करवाया —
“अब से हम सब पेड़ लगाएंगे, जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाएंगे।
यह सिर्फ़ हमारे लिए नहीं, बल्कि उन जीवों के लिए भी जो हमारे साथ इस धरती पर रहते हैं।”

लोगों ने मिलकर हजारों पेड़ लगाए।
राजा खुद हर दिन जंगल जाकर देखता कि पेड़ बढ़ रहे हैं या नहीं।
धीरे-धीरे, कुछ महीनों बाद, जंगल फिर से हरे हो गए।
पक्षी लौट आए, जानवर लौट आए, और अब ड्रैगन को गाँवों पर हमला करने की ज़रूरत नहीं रही।

दोबारा मुलाकात

कुछ सालों बाद, राजा फिर से उस पहाड़ की ओर गया।
वह ड्रैगन की गुफा तक पहुँचा।
इस बार गुफा के आस-पास हरी-भरी घास उग आई थी, पेड़ों पर फल लगे थे।

Shikshaprad Kahani in Hindi Mein
शिक्षाप्रद कहानी हिंदी में

ड्रैगन बाहर आया, पर अब उसकी आँखों में ग़ुस्सा नहीं था।
उसने सिर झुका कर कहा,
“राजा धर्मवीर, तुमने अपना वादा निभाया। अब मेरे पास सब कुछ है। मैं अब किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”

राजा मुस्कुराया और बोला,
“सच्चा वीर वो नहीं जो तलवार से जीतता है, बल्कि वो जो किसी के दिल को समझकर जीतता है।”

कहानी से नैतिक शिक्षा

उस दिन के बाद राज्य में कभी कोई डर नहीं रहा।
ड्रैगन अब सबका दोस्त बन गया। बच्चे कहते – “देखो, वो हमारा पहाड़ों वाला रक्षक है।”

राजा धर्मवीर ने सबको यह सिखाया कि
समस्या को समझ से हल किया जा सकता है,
और असली ताकत प्यार और दया में होती है,
न कि युद्ध और हिंसा में।

2. हाथी और बतख | नैतिक कहानी

नीलकंठ जंगल बहुत सुंदर और शांत जगह थी। वहाँ रंग-बिरंगे फूल, मीठा पानी और ठंडी हवा थी। लेकिन अजीब बात ये थी कि वहाँ कोई किसी से बात नहीं करता था। हर जानवर बस अपने काम में लगा रहता था – ना हँसी, ना दोस्ती, बस सन्नाटा।

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Sikshaprad Kahani

उसी जंगल में एक बड़ा और समझदार हाथी रहता था, जिसका नाम था बदरंग। वो बहुत शांत था, पर हमेशा अकेला महसूस करता था। उसे अक्सर लगता, “इतना सुंदर जंगल है, फिर भी सब इतने चुप क्यों हैं?

एक दिन दूर देश से एक प्यारी सी बतख आई, उसका नाम था झिलमिली। वो बहुत खुशमिजाज, बातूनी और हमेशा मुस्कुराने वाली थी। जब उसने देखा कि पूरा जंगल इतना चुप है, तो उसने सोचा, “मैं इस जंगल में फिर से हँसी लौटाऊंगी!

वो उड़ते-उड़ते बदरंग के पास गई और बोली,
Hi! आप इतने बड़े और समझदार लगते हो, क्या आप हँसना भूल गए हो?”

बदरंग थोड़ा चौंका, किसी ने उससे बहुत सालों बाद बात की थी।
उसने धीरे से कहा, “मैंने कभी किसी को हँसते नहीं देखा, तो खुद भी भूल गया।”

झिलमिली मुस्कराई और बोली, “अगर आप मेरे साथ एक खेल खेलें, तो शायद आपको मजा आए!

फिर उसने जंगल के सब जानवरों को बुलाया और कहा,
हम एक खेल खेलेंगे – गूंगे जानवर बोलेंगे। इसमें हर कोई अपने मन की एक बात बोलेगा – डर, सपना या सवाल, कुछ भी!”

सब पहले तो चुप रहे, फिर बदरंग ने सबसे पहले बोला,
मुझे हमेशा लगता था कि मेरी आवाज़ बहुत भारी है, इसलिए कोई मुझसे बात नहीं करता।

तब खरगोश बोला,
“मुझे लगा मैं बहुत छोटा हूँ, इसलिए कोई मेरी बात नहीं सुनेगा।”

धीरे-धीरे सबने अपनी बातें कहीं।
और बहुत समय बाद, नीलकंठ जंगल में हँसी और बातें गूंज उठीं।

बदरंग ने झिलमिली से कहा,
“तुमने हमें हमारी चुप्पी से आज़ाद किया। अब ये जंगल सच में जिंदा लग रहा है।”

झिलमिली मुस्कराई और बोली,
“आवाज़ कभी बड़ी या छोटी नहीं होती, बस कोई सुनने वाला चाहिए।”

कहानी से शिक्षा

हमेशा अपनी बात कहने से डरना नहीं चाहिए। चुप रहना आसान है, लेकिन बोलना और सुनना ही सच्चे रिश्ते बनाते हैं।

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