माँ की चिट्ठी – एक दिल छू लेने वाली कहानी | Short Emotional Story in Hindi

दोस्तों आज Short Emotional Story in Hindi में हम एक माँ के त्याग और बलिदान की बहुत ही इमोशनल स्टोरी पढ़ेंगे, किस तरह एक माँ अपने बच्चे के लिए अपनी पूरी जिंदिगी लगा देती है, अपने सपने को त्याग देती है, ताकि उसका बच्चा कामयाब हो जाए।

Short Emotional Story in Hindi

दिल्ली की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में, आरव का दिन सुबह सूरज निकलने से पहले शुरू होता और देर रात खत्म होता।

कंपनी की बड़ी-बड़ी फाइलें, क्लाइंट की मीटिंग्स, टीम के ईमेल…
उसकी लाइफ एक मशीन की तरह चल रही थी।

लेकिन इस मशीन की लगातार भागदौड़ में, एक चीज़ धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी-
उसकी माँ।

माँ सुनीता गाँव में अकेली रहती थीं।
घर बड़ा नहीं था, पर उनकी ममता इतनी थी कि उस छोटे घर में भी किसी को कमी महसूस नहीं होती।

आरव बचपन में उनके दुपट्टे से चिपककर चलता था।
पर आज… फोन तक ठीक से नहीं उठाता

उस दिन मौसम थोड़ा शांत था।
आरव ने सोचा, “चलो कमरे को थोड़ा साफ कर लूँ।

अलमारी के ऊपर से उसने एक पुराना डिब्बा नीचे उतारा।
डिब्बा गिरते ही एक आवाज़ आई ठक!
और उसके साथ गिरा उसका बचपन… उसका पुराना पीला स्टील का टिफ़िन

वही टिफ़िन…
जिसमें माँ रोज़ प्यार भरकर खाना रखती थीं।

उस टिफ़िन को हाथ में लेते ही एक झटके में सब याद आने लगा-
स्कूल के दिन, क्लास के बीच का ब्रेक, टिफ़िन खोलते ही आती माँ के हाथों की खुशबू

उसे लगा, जैसे वो फिर से वही छोटा बच्चा बन गया है।

टिफ़िन की जंग और माँ की जंग

टिफ़िन पर थोड़ी जंग लगी थी।
लेकिन उस जंग में भी एक कहानी थी
समय की, संघर्ष की, माँ की मेहनत की।

याद आया…
माँ रोज़ सुबह 4 बजे उठतीं।
गैस जलातीं, आटा लगातीं, सब्ज़ी बनातीं।
और खुद खाना न खाकर कह देतीं, “मुझे भूख नहीं है, तू पहले खा ले।

आज वही टिफ़िन उसके हाथ में था।
जैसे कह रहा हो
“तू माँ को भूल गया, पर माँ ने तुझे कभी नहीं भुलाया।”

माँ की चिट्ठी का मिलना

आरव ने धीरे से टिफ़िन खोला।
अंदर से एक पुरानी मुड़ी हुई चिट्ठी निकली।

शायद वो चिट्ठी कभी उसके हाथों तक पहुंच ही नहीं पाई थी।
शायद वो जल्दबाज़ी में उसे निकालकर कहीं फेंक देता…
पर आज, इसी चिट्ठी ने उसे रोक लिया।

कागज़ को खोलते हुए उसके हाथ काँप गए।
जैसे उस कागज़ में कोई साधारण शब्द नहीं…
बल्कि उसकी माँ का धड़कता हुआ दिल छुपा हो।

“मेरे प्यारे बेटे आरव,

जब तू ये टिफ़िन खोलेगा, हो सकता है मैं तेरे पास न दिखूँ…
पर मेरा दिल, मेरा प्यार, मेरे आशीर्वाद-सब तेरे साथ होंगे।

तू बड़ा होकर बहुत व्यस्त हो जाएगा, बहुत आगे जाएगा…
पर बस इतना याद रखना कि दुनिया की भीड़ में भी तेरे पीछे एक माँ है,
जो सिर्फ तेरी मुस्कुराहट के लिए ज़िंदा है।

तू जब खाना खाए तो याद रखना,
ये सिर्फ सब्ज़ी या पराठा नहीं… ये मेरी दुआएँ हैं।

और बेटा,
अगर कभी मन करे… तो फोन कर लेना।
तेरी एक ‘हैलो माँ’ मुझे कई दिनों का सुकून दे देती है।

– तेरी माँ”

चिट्ठी पढ़कर आरव का दिल भर आया।
शब्दों की सरलता में ऐसी गहराई थी…
कि जैसे किसी ने दिल को मुलायम उँगलियों से सहला दिया हो,
और फिर अचानक कसकर पकड़ लिया हो।

उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे
धीमे, पर लगातार।

पछतावे की दीवारें

आरव को एक-एक पल याद आने लगा-
माँ का वीडियो कॉल करना और उसका कट कर देना।
माँ का पूछना- “खाया बेटा?”
और उसका चिड़कर कहना- “माँ प्लीज़, टाइम नहीं है।”

उसे लगा…
उसने सफलता के पीछे भागते हुए अपनी जड़ें ही नज़रंदाज़ कर दीं
जैसे एक पेड़ अपनी मिट्टी को भूल गया हो।

वो बैठा रहा… बहुत देर तक।
चिट्ठी उसके हाथ में थी, माँ उसके दिल में।

दिल का फैसला

अचानक उसने मोबाइल उठाया और माँ को कॉल मिलाया।
फोन बजता रहा…
हर घंटी उसके दिल में एक सुई की तरह चुभ रही थी।

तीसरी घंटी पर माँ ने उठाया-
थोड़ी थकी हुई आवाज़, लेकिन वही पुराना प्यार।
“हाँ बेटा?”
आरव कुछ बोल ही नहीं पाया।
बस साँसें उखड़ सी गईं।

आरव? सब ठीक है ना?
माँ की आवाज़ में चिंता थी।
लंबे रुक के बाद उसने कहा,
“माँ… मैं आ रहा हूँ। आज ही।”

माँ हंस दीं,
अरे अचानक? क्या हुआ?
लेकिन आवाज़ में छुपी खुशी को कोई नहीं छुपा सकता।

आरव ने बस इतना कहा,
आपकी याद आ गई माँ… बहुत ज़्यादा।

शाम होते-होते आरव गाँव पहुँच गया।
बस से उतरते ही उसने देखा-
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

उनकी आँखों में आंसू तैर रहे थे,
लेकिन होंठों पर मुस्कुराहट थी-
वो मुस्कुराहट जो सिर्फ माँ को ही आती है जब वो अपने बच्चे को देखती हैं।

आरव उनके पास भागा और उन्हें कसकर गले लगा लिया।
माँ का हाथ उसके सिर पर गया…
और उसी पल जैसे उसके सारे टूटे हुए हिस्से जुड़ गए।

माँ ने कहा,
“चल, खाना लगा दूँ। तेरी पसंद की सब्ज़ी भिंडी बनाई है।”

आरव ने आँसू पोंछते हुए कहा,
“आज मैं बनाऊंगा माँ… आपने बहुत बनाया मेरे लिए।”

माँ मुस्कुराईं,
बच्चे कभी माँ से बड़े नहीं होते।

उस रात मां-बेटे देर तक बैठे रहे-
पुरानी यादें, नए किस्से, छोटी-छोटी बातें…
सब कुछ।
जैसे वो दूरी जो सालों से बढ़ रही थी,
आज एक ही रात में मिट गई हो।

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माँ ने कहा,
“बेटा, मैं तुझे रोकती नहीं। तू आगे बढ़, दुनिया देख… बस ये मत भूलना कि कोई है जो तेरी राह देखता है।”

आरव ने उनका हाथ पकड़ा,
“अब कभी नहीं भूलूंगा माँ। कभी नहीं।”

कहानी से सीख (Moral of the Story)

कुदरत ने हर इंसान को बहुत रिश्ते दिए हैं…
पर माँ का रिश्ता सिर्फ दिल से बनाया जाता है।
समय किसी के लिए नहीं रुकता,
पर माँ हमेशा हमारे लिए रुक जाती है।
उनसे ज्यादा निस्वार्थ, सच्चा और गहरा प्यार… दुनिया में कहीं नहीं।


माँ का प्यार | Heart Touching Story

गाँव के किनारे मिट्टी की खुशबू से भरा एक छोटा-सा घर था।
उस घर में रहती थी कविता, जो बहुत सीधी-सादी लेकिन दिल की बहुत मजबूत औरत थी।
उसके जीवन का एक ही सहारा था – उसका बेटा ऋषि
पति के गुजर जाने के बाद उसी ने अकेले बेटे को पाला।
गरीबी थी, पर उसने कभी शिकायत नहीं की।
वह रोज़ सुबह उठकर खेतों में काम करती और शाम को बेटे को पढ़ाती।

Beta Aur Ma Ki Emotional Heart Touching Story in Hindi
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कविता हमेशा ऋषि से कहती,


बेटा, गरीबी कोई बुराई नहीं होती, बुराई तब होती है जब इंसान गलत रास्ता चुन ले।”

ऋषि उसकी बातें ध्यान से सुनता और मुस्कुराकर कहता,

माँ, मैं हमेशा आपका सिर ऊँचा करूँगा।”

वक़्त बीतता गया। ऋषि बड़ा हुआ, पढ़ाई पूरी की और गाँव में सबका लाड़ला बन गया। जब वह शहर नौकरी के लिए जाने लगा, तो कविता ने आँसुओं में भी मुस्कुराकर कहा,
“बेटा, शहर बड़ा है, वहाँ अच्छे लोग भी मिलेंगे और बुरे भी। बस याद रखना, सच्चाई कभी मत छोड़ना।”
ऋषि ने माँ के पाँव छुए और कहा, “माँ, मैं कभी आपको निराश नहीं करूँगा।

शहर की ज़िंदगी आसान नहीं थी।
शुरू में उसने बहुत संघर्ष किया। सस्ता कमरा, साधारण खाना, और दिनभर काम की तलाश।
कुछ महीनों बाद उसे एक अच्छी कंपनी में काम मिल गया।
खुशी से उसने माँ को फोन किया –
“माँ, अब मैं मैनेजर बन गया हूँ, आपकी दुआ रंग लाई!”
कविता ने खुशी में कहा, “मुझे पता था बेटा, मेहनत करने वाले को भगवान कभी खाली हाथ नहीं लौटाता।”

धीरे-धीरे शहर की चमक ने ऋषि का मन बदलना शुरू किया।
कंपनी में कुछ ऐसे लोग मिले जो चालाक थे।
वे दिखावे में तो दोस्त लगते, लेकिन अंदर से गलत कामों में शामिल थे।
एक दिन उन्होंने ऋषि से कहा, “थोड़ा-सा काम है, बस कागज़ों में थोड़ा हेरफेर करना है, पैसे बहुत मिलेंगे।”
पहले तो ऋषि ने मना किया, पर फिर उसने सोचा, “बस एक बार, फिर कभी नहीं।

लेकिन यही एक बार उसकी सबसे बड़ी गलती बन गई।
धीरे-धीरे वह उन्हीं लोगों के साथ गलत कामों में फँस गया।
उसे पता था कि वह गलत कर रहा है, पर अब पीछे लौटना मुश्किल हो गया था।

एक दिन पुलिस ने एक गैरकानूनी सौदे में उसे पकड़ लिया।
हाथों में हथकड़ी लगी, और अगले दिन उसका नाम अखबारों में छप गया – “कंपनी का मैनेजर गिरफ्तार।”

शहर में सबको पता चल गया, पर गाँव की कविता को नहीं।
वो रोज़ की तरह सुबह उठती, भगवान से बेटे के लिए दुआ करती
और गाँव के लोगों से कहती, “मेरा बेटा अब बड़ा आदमी बन गया है, शहर में मैनेजर है।
उसे क्या पता, उसका बेटा जेल में है।

कुछ दिन जेल में रहने के बाद ऋषि को जमानत मिल गई।
वहाँ की ठंडी दीवारों और अंधेरी रातों ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया।
वो खुद से कहने लगा, “मैंने माँ की मेहनत और प्यार का ये सिला दिया? मैं कैसा बेटा हूँ?

जेल से निकलते ही वो सबसे पहले गाँव गया।
घर के बाहर पहुँचा तो कविता आँगन में बैठी चूल्हा जला रही थी।
जैसे ही उसने बेटे को देखा, उसकी आँखें चमक उठीं, “अरे ऋषि! अचानक कैसे आ गया?
ऋषि कुछ नहीं बोल पाया।
बस माँ के पाँवों में गिर गया और रोने लगा, “माँ, मैंने गलती की… मैं बुरे रास्ते पर चला गया था...”

कविता ने बेटे के सिर पर हाथ रखा
और बोली, “बेटा, गलती सबसे होती है। अगर दिल से पछतावा हो, तो इंसान फिर से अच्छा बन सकता है। अब सब छोड़ दे, फिर से नई शुरुआत कर।”

इन शब्दों ने ऋषि की ज़िंदगी बदल दी।
वो फिर शहर लौटा, पुराने दोस्तों से नाता तोड़ा
और मेहनत से सच्ची नौकरी की तलाश शुरू की।
शुरू में बहुत मुश्किलें आईं। लोग उस पर भरोसा नहीं करते थे।
पर उसने हार नहीं मानी। दिन-रात मेहनत की। धीरे-धीरे किस्मत फिर से उस पर मेहरबान होने लगी।

कुछ महीनों बाद उसे एक ईमानदार कंपनी में काम मिल गया।
इस बार वो सच में मेहनत से आगे बढ़ा।
वो रोज़ माँ को फोन करता और कहता,

“माँ, अब सब ठीक चल रहा है। इस बार मैं सच के रास्ते पर हूँ।”
कविता हर बार मुस्कुराकर कहती, “मुझे बस यही सुनना था बेटा।”

कुछ साल बाद ऋषि ने माँ को शहर बुलाया।
उसे अपने ऑफिस दिखाया, अपने साथ खाना खिलाया, और कहा,
“माँ, ये सब आपकी दुआओं का फल है। अगर आपने मुझे माफ़ नहीं किया होता, तो मैं आज यहाँ नहीं होता।”
कविता ने बेटे को गले लगाते हुए कहा,
“मुझे पता था, माँ हूँ न तेरी।”

अब गाँव में जब कोई माँ अपने बच्चे को समझाती, तो कहती,
“बेटा, याद रखना जैसे कविता के बेटे ने सही रास्ता चुन लिया, वैसे ही सच्चाई हमेशा इंसान को वापस सही राह पर ले आती है।”

ऋषि ने अपनी ज़िंदगी में बहुत गलतियाँ कीं, लेकिन एक माँ का प्यार उसे फिर से सही इंसान बना गया।

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माँ की भूख – एक सच्ची और दिल छू लेने वाली कहानी

गाँव के कोने में एक छोटा-सा घर था। दीवारें कच्ची, छत टपकती हुई, लेकिन उस घर में एक बहुत बड़ी दौलत थी – माँ का दिल।
उस घर में रहती थी फातिमा बीबी अपने चार बेटों और पति सलीम के साथ।

Emotional Kahani in Hindi
Emotional Kahani in Hindi

सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही फातिमा उठ जातीं।
मिट्टी के चूल्हे में लकड़ी जलातीं, धुआँ आँखों में जाता लेकिन वो मुस्कुराती रहतीं।
बच्चों के लिए रोटियाँ बनाती, पानी भरती, और फिर सबको प्यार से उठाकर खाना खिलाती।

घर छोटा था, पैसा बहुत कम, पर प्यार बहुत ज़्यादा था
हर दिन किसी न किसी चीज़ की कमी रहती – कभी आटे की, कभी तेल की, कभी दवाई की – लेकिन फातिमा हमेशा कहतीं,

“बस मेरे बच्चे मुस्कुरा लें, बाकी सब ठीक है।”

💔 पति की बेबसी – नौकरी नहीं, सिर्फ़ इंतज़ार

सलीम पढ़ा-लिखा आदमी था। ईमानदार भी था।
वो गाँव से शहर तक हर जगह नौकरी की तलाश में गया।
कई बार इंटरव्यू दिए, कागज़ भरे, लाइन में लगा रहा – लेकिन हर जगह एक ही बात सुनने को मिलती,

“थोड़ा पैसा दे दो भाई, काम हो जाएगा।”

सलीम का दिल टूट जाता।
वो कहता, “मेरे पास खुद के बच्चों के लिए दूध नहीं है, रिश्वत कहाँ से दूँ?

धीरे-धीरे उम्मीद भी कम होने लगी।
लेकिन उसने हार नहीं मानी।
एक दिन बोला, “अगर कोई मुझे नौकरी नहीं देगा, तो मैं खुद अपने हाथों से कुछ करूँगा।”

बस उसी दिन से उसने घर के पीछे के खाली ज़मीन पर मुर्गीपालन (चिकन फार्म) शुरू किया।
थोड़ी-सी ज़मीन में सब्ज़ी भी उगाने लगा।
धूप, बारिश, कीचड़ – किसी चीज़ की परवाह नहीं।

फातिमा भी साथ देती।
दिन में खेत में काम, शाम को घर का काम।
रात को थककर जब बिस्तर पर गिरती तो बस एक ही ख्याल आता —

“कल बच्चों को क्या खिलाऊँगी?”

माँ की भूख – जो किसी ने नहीं देखी

धीरे-धीरे हालत और भी खराब होती गई।
कभी-कभी घर में इतना कम खाना होता कि सबको पेट भर के नहीं मिलता।

एक दिन ऐसा आया जब घर में बस चार रोटियाँ थीं – और पाँच लोग।
चार छोटे बच्चे भूख से रो रहे थे।

फातिमा ने सब बच्चों की थाली में एक-एक रोटी रखी और खुद बोली –

“मुझे भूख नहीं है, मैं बाद में खा लूँगी।”

बच्चे खुश होकर खाने लगे।
फातिमा मुस्कुराई, पर अंदर से उसका पेट जल रहा था।

रात को जब सब सो गए, वो चुपचाप उठी, चूल्हे के पास गई, और सिर्फ़ पानी पीकर बैठ गई।
उसकी आँखों में आँसू थे।
वो आसमान की तरफ देखती हुई बोली –

“ऐ खुदा, मेरे बच्चों को भूखा मत रखना, चाहे मुझे भूखा रख लेना।”

ऐसे ही दिन, महीने और साल बीतते गए।
भूख उसकी साथी बन गई।
धीरे-धीरे उसका शरीर कमजोर पड़ने लगा।

बीमारी – जब माँ खुद टूटने लगी

एक दिन फातिमा बेहोश हो गई।
सलीम घबरा गया।
किसी तरह पैसे जुटाकर उसे अस्पताल ले गया।

डॉक्टर ने कहा,

“पेट में इंफेक्शन है, बहुत पुरानी बीमारी है। कई दिन तक खाना नहीं मिला होगा।”

सलीम की आँखों से आँसू बह निकले।
वो सोच रहा था – “मेरी औरत ने सबको खिलाया, खुद को नहीं।

कई महीने इलाज चला।
घर का खर्च फिर बढ़ गया, लेकिन इस बार किस्मत थोड़ी मेहरबान थी।

कई महीने बाद, जैसे ऊपरवाले को तरस आ गया हो, एक दिन सलीम को एक सरकारी दफ्तर में नौकरी मिल गई।
छोटा-सा क्लर्क का काम था, पर उसके लिए वो सबसे बड़ी खुशखबरी थी।

घर में पहली बार अच्छे कपड़े आए, बच्चों के लिए दूध आया, और रसोई से फिर से खुशबू आने लगी।
फातिमा की आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वो खुशी के थे।

वो धीरे-धीरे ठीक होने लगीं।
अब बच्चे स्कूल जाते, सलीम रोज़ काम पर जाता, और घर में फिर से हँसी गूंजती।

🎓 बच्चों की मेहनत – माँ का सपना पूरा हुआ

समय बीतता गया।
सबसे बड़ा बेटा आरिफ़ कॉलेज में गया।
फातिमा दिन-रात दुआ करतीं,

“बस मेरा बेटा काबिल बन जाए।”

और ऊपरवाले ने सुन ली।
आरिफ़ को एक अच्छी नौकरी मिल गई।
उसके बाद एक-एक करके बाकी तीनों बेटे भी अपने पैरों पर खड़े हो गए।

अब घर पक्का बन गया।
दीवारों पर पेंट है, फर्श चमकता है, और रसोई में खुशबू फैलती है।
लेकिन माँ वही है – सादी, शांत, और हमेशा अपने परिवार के लिए दुआ करने वाली।

आज फातिमा बूढ़ी हो गई हैं।
बाल सफेद हो चुके हैं, चेहरा झुर्रियों से भरा है, लेकिन दिल पहले से ज़्यादा नरम है।

जब चारों बेटे उनके पास बैठते हैं, उनके पैर दबाते हैं, तो वो मुस्कुराकर कहती हैं –

“अब पेट नहीं जलता बेटा, क्योंकि दिल भरा है।”

वो अब भी कम खाती हैं, लेकिन अब कमी की वजह से नहीं,
बल्कि संतोष की वजह से।

कहानियां लिखकर कमाना चाहते हैं तो इस पोस्ट “कहानी लिखकर पैसे कमाने के तरीके” को ज़रूर पढ़ें।

💖 अंत – माँ की ममता कभी भूखी नहीं रहती

माँ वो होती है जो खुद भूखी रहकर भी बच्चों को खिलाती है।
वो जो हर दर्द छिपा लेती है, ताकि उसके बच्चे मुस्कुराते रहें।
फातिमा की कहानी सिर्फ़ एक माँ की नहीं –
हर उस औरत की है जिसने अपने परिवार के लिए सब कुछ सहा, लेकिन कभी शिकायत नहीं की।

सच में, फातिमा जैसी माँएँ ही इस दुनिया की सबसे बड़ी दौलत हैं।

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माँ के त्याग की कहानी

एक छोटे से गाँव में रहने वाली निर्मला देवी और उनके बेटे रोहन की emotional story दिल को छू लेने वाली है। निर्मला देवी, एक साधारण गृहिणी थीं, जिन्होंने अपने बेटे को हर मुश्किल परिस्थिति में सहारा दिया। उनका जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

Short Emotional Story in Hindi
Short Emotional Story in Hindi

रोहन, बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था। उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपने थे। निर्मला देवी ने अपने बेटे के इन सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत की। वे सुबह-सुबह उठकर खेतों में काम करतीं, फिर दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा करतीं ताकि रोहन की पढ़ाई का खर्चा उठा सकें।

रोहन को हमेशा से अपनी माँ का संघर्ष दिखाई देता था। उसने ठान लिया था कि वह कुछ बड़ा करेगा और अपनी माँ की जिंदगी बदल देगा। रोहन की मेहनत और लगन के कारण वह शहर के एक अच्छे कॉलेज में दाखिला पाने में सफल हुआ। यह खुशी का पल था, लेकिन इसके साथ ही निर्मला देवी के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई। अब उसे रोहन की कॉलेज की फीस के लिए और अधिक मेहनत करनी थी।

निर्मला देवी ने अपनी छोटी सी जमीन गिरवी रख दी ताकि रोहन का दाखिला हो सके। रोहन को यह बात बहुत तकलीफ देती थी, लेकिन उसकी माँ ने हमेशा उसे समझाया कि यह सब उसकी पढ़ाई के लिए है।

शहर में पढ़ाई के दौरान, रोहन ने अपनी माँ की मेहनत को और गहराई से समझा। उसने महसूस किया कि उसकी माँ ने अपने सपनों को त्याग कर उसके सपनों को पूरा करने का बीड़ा उठाया है। वह अपने हर कदम पर अपनी माँ की मेहनत और त्याग को याद रखता।

चार साल की कड़ी मेहनत और संघर्ष के बाद, रोहन ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और उसे एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। यह खुशी का पल था, लेकिन रोहन ने सोचा कि असली खुशी तब होगी जब वह अपनी माँ को उनका खोया हुआ सम्मान और सुख लौटा पाएगा।

नौकरी के पहले ही महीने में, रोहन ने अपनी माँ के लिए एक सुंदर सा घर खरीदने का फैसला किया। उसने अपनी माँ को शहर बुलाया और उन्हें घर दिखाया। निर्मला देवी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उनका बेटा इतना बड़ा सपना पूरा करेगा।

लेकिन रोहन ने सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रखा। उसने अपनी माँ की गिरवी रखी जमीन भी वापस खरीद ली और उन्हें वह खेत भी वापस लौटा दिया, जहां उन्होंने अपना जीवन संघर्ष करते हुए बिताया था। निर्मला देवी अब गर्व महसूस कर रही थीं कि उनका बेटा उनकी मेहनत और त्याग को समझता है।

इस कहानी का अंत बेहद भावनात्मक था। एक दिन, जब रोहन अपनी माँ के साथ घर के आँगन में बैठा हुआ था, निर्मला देवी ने कहा, “रोहन, मैंने तुझे बड़ा करने के लिए जो भी किया, वह मेरा कर्तव्य था। लेकिन तूने जो कुछ मेरे लिए किया, वह मेरे सपनों से भी बढ़कर है।

रोहन ने अपनी माँ का हाथ पकड़ते हुए कहा, “माँ, जो कुछ भी मैं हूँ, वह आपकी वजह से हूँ। आपने मुझे जो शिक्षा और संस्कार दिए, वही मेरी ताकत हैं।”

उस दिन, दोनों माँ-बेटे ने महसूस किया कि असली खुशी पैसे या सफलता में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए सुखद पलों में है।

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Moral of the Story

यह कहानी सिर्फ एक माँ और बेटे की नहीं है, बल्कि हर उस रिश्ते की है जो त्याग, प्रेम और समर्पण पर आधारित है। जिस रिश्ते में प्यार होता है, वहां त्याग और समर्पण होता है, और सही मायने में इसी को तो रिश्तेदारी निभाना कहते हैं।

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