आरव और नंदिनी की शादी को पाँच साल हो चुके थे। पाँच साल जो बाहर से देखने में कम लगते हैं, लेकिन अंदर से बहुत कुछ बदल देते हैं।
इन पाँच सालों में दोनों ने एक-दूसरे के साथ हँसना सीखा, रोना सीखा, चुप रहना भी सीखा।
नंदिनी सुबह सबसे पहले उठती। आरव के लिए चाय बनाती, उसकी शर्ट प्रेस करती और जाते समय दरवाज़े तक छोड़ने आती।
आरव भी जाते-जाते बस इतना कह देता
“ध्यान रखना।”
यही दो शब्द नंदिनी का पूरा दिन बना देते थे।
नंदिनी घर संभालने के साथ-साथ अपना छोटा सा ऑनलाइन बुटीक चलाती थी। उसे अपने काम से बहुत प्यार था। आरव हमेशा कहता
“तुम पर मुझे गर्व है।”
यही गर्व नंदिनी की सबसे बड़ी ताकत थी।
आरव की बहन पायल भी उसी घर में रहती थी। शादी से पहले आरव ही उसका सब कुछ था।
कोई परेशानी होती-भैया।
कोई खुशी होती-भैया।
लेकिन शादी के बाद पायल को लगने लगा कि उसका भैया उससे दूर जा रहा है।
अब आरव देर से आता, ज़्यादा बात नंदिनी से करता, फैसले भी उसी से पूछकर लेता।
पायल के मन में एक खालीपन बैठ गया।
और वही खालीपन धीरे-धीरे जलन बन गया।
वह नंदिनी से सीधे कुछ नहीं कहती थी, लेकिन मन ही मन तुलना करती रहती
“अब तो भैया सिर्फ भाभी की ही सुनते हैं।”
वह दिन, जो सब कुछ ले डूबा
एक दिन नंदिनी को अपने काम के लिए बाहर जाना पड़ा। उसका कज़िन भाई रोहन शहर आया हुआ था। वही उसे कार से ले गया।
रोहन नंदिनी को सगी बहन की तरह मानता था। दोनों बचपन से साथ पले थे।
नंदिनी को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि यही बात उसकी ज़िंदगी में तूफ़ान ले आएगी।
जब वे दोनों कार में बैठे बात कर रहे थे, उसी समय पायल ने उन्हें देख लिया।
उसने सच जानने की कोशिश नहीं की।
उसने सिर्फ़ मान लिया।
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शक की शुरुआत
शाम को आरव घर आया।
पायल ने बहुत सामान्य आवाज़ में कहा
“भैया, आज मैंने भाभी को किसी लड़के के साथ कार में देखा।”
आरव का हाथ रुक गया।
“कौन लड़का?” उसने पूछा।
“पता नहीं… लेकिन वो दोनों बहुत आराम से थे,” पायल ने बात को थोड़ा मोड़कर कहा।
बस, यहीं से सब बदल गया।
आरव ने नंदिनी से कुछ नहीं पूछा।
उसने अपनी पत्नी की आँखों की सच्चाई से ज़्यादा, किसी और की बातों पर भरोसा कर लिया।
चुप्पी का दर्द
नंदिनी ने महसूस किया कि आरव बदल गया है।
वह अब पहले की तरह बात नहीं करता।
उसकी आँखों में अब अपनापन नहीं, सवाल होते थे।
नंदिनी रात को अकेले बैठकर सोचती
“मैंने क्या गलत किया?”
एक दिन उसने पूछा
“आरव, क्या तुम मुझसे खुश नहीं हो?”
आरव ने बिना देखे कहा
“तुम जैसी हो, वैसी नहीं रहीं।”
ये शब्द नंदिनी के दिल में चुभ गए।
पायल अब खुलकर बातें करने लगी
“आजकल लोग भरोसे के लायक नहीं रहे…”
“औरतें भी बदल जाती हैं…”
नंदिनी सब सुनती रही।
वह चुप रही क्योंकि उसे भरोसा था
आरव उस पर भरोसा करेगा।
लेकिन वह भरोसा टूट रहा था।

एक रात झगड़ा बहुत बढ़ गया।
आरव ने ऊँची आवाज़ में कहा
“मुझे सब पता है!”
नंदिनी काँपते हुए बोली
“क्या पता है तुम्हें?”
आरव ने शक भरी नज़रों से देखा
“तुम सच नहीं बोल रही।”
नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
“अगर तुम्हें मुझ पर शक है, तो मैं यहाँ क्यों हूँ?”
ग़ुस्से और चोट में आरव बोल पड़ा
“शायद हमें अलग हो जाना चाहिए।”
ये शब्द तलवार की तरह नंदिनी के दिल में उतर गए।
अगली सुबह नंदिनी ने चुपचाप अपना बैग रखा।
घर की दीवारों को देखा
जहाँ हँसी थी, सपने थे।
और बिना कुछ कहे मायके चली गई।
माँ ने बस उसे सीने से लगा लिया।
रोहन को जब यह सब पता चला, वह सीधे आरव के पास गया।
उसने हर सबूत दिखाया।
हर बात साफ़ की।
आरव को पहली बार एहसास हुआ-
उसने प्यार से पहले शक को चुना।
उसने पायल से पूछा।
पायल रो पड़ी।
उसकी सच्चाई सामने आ गई।
आरव दौड़ता हुआ नंदिनी के पास पहुँचा।
दरवाज़ा खुला।
नंदिनी सामने थी
थकी हुई, टूटी हुई।

आरव रोते हुए बोला
“मुझे माफ़ कर दो… मैंने तुम्हें खो दिया था।”
नंदिनी ने कहा
“सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है, जब अपना ही शक करे।”
बहुत देर बाद नंदिनी बोली
“अगर भरोसा लौट सकता है, तो रिश्ता भी लौट सकता है।”
आरव ने वादा किया-
अब कभी शक नहीं, सिर्फ़ भरोसा।
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इस कहानी से सीख
कई रिश्ते प्यार से नहीं टूटते,
शक से टूटते हैं।
और कई रिश्ते
सच और माफी से फिर जुड़ जाते हैं। 💔➡️❤️